Friday, November 10, 2023


children




कितने बेखबर रहते थे हम इस दुनिया के झंझटों से!
जब माँ- बाप के पास और उनके साथ रहते थे!!
न जाने कब दिन और कब दिन से फिर रात,
अब तो सुबह जल्दी घर से निकलते है और,
और फिर जल्दी घर जाने के लिए रात का इंतज़ार करते है,
रोज सुबह पापा के साथ घर के बाहर हरे मैदान में कुछ देर की सैर करता था,
और आराम से घर आकर इक गिलास दूध पीता था,
अब तो बस दफ्तर जाने की जल्दी होती है,
इक कूप चाय मुनासिब हो जाये बस वही बहुत है,
हर पल और हर दिन का लुफ्त उठाया करते थे,
कितने बेखबर थे हम इस दुनिया के झंझटो से!
जब  माँ- बाप के पास और उनके साथ रहते थे!!
सुबह उठकर माँ के पैर छूकर आशिर्बाद लिया करते थे,
बस यूँ लगता था मानो अब आज का दिन शुभ है,
अब तो बस सुबह- सुबह बॉस ताने सुनते है ,
अपनी समस्याओं की तो कोई खबर ही न थी,
सब माँ- बाप पे छोड़ दिया करते थे,
पर अब तो दिन गुजर जाता है दफ्तर में रोज इक नयी समस्या सुलझाने में,
कितने बेखबर रहते थे हम इस दुनिया के झंझटों से!
जब माँ- बाप के पास और उनके साथ रहते थे!!
वो छोटी सी कुर्सी जो मैंने रामलीला के मेले से जिद करके मंगाई थी पापा से,
बड़ा ही सुकून मिला करता था उस कुर्सी पर बैठकर,
पर आज उस दफ्तर की कुर्सी पर तो सारा दिन बीत जाता है,
पर न जाने क्यों वो वाला आराम और सुकून नहीं मिलता,
कुछ ज्यादा कीमती न हुआ करते थे वो छोटे-छोटे खिलौने,
पर न जाने क्यों वो इक अजीब सी ख़ुशी का अहसास दिलाया करते थे,
कितने बेखबर रहते थे हम इस दुनिया के झंझटों से!
जब माँ- बाप के पास और उनके साथ रहते थे!!
जब खाने के लिए माँ बुलाया करती थी,
बड़े नखरे हुआ करते थे तब, तुरई,लौकी,और बैंगन बनने पे रूठ जाया करते थे,
और फिर क्या बस मेरे मनपसंद आलू के पराठे बन जाया करते थे,
अब तो इतना थक जाते है शाम को घर आने तक,
की बस चाटने रोटी ही खाकर सो जाया करते है,
कितने बेखबर रहते थे हम इस दुनिया के झंझटों से!
जब माँ- बाप के पास और उनके साथ रहते थे!!
होली के दिन अपने मनपसंद कपडे लाया करते थे,
दिवाली पे पटाखों और फुलझड़ियो को भी बेहिसाब लाया करते थे,
अब तो कपडे और पटाखे खरीदने से पहले जेब टटोलते है,
पैसो का हिसाब ही नहीं करते थे हर रोज जेब में थोड़े खुदबखुद आ जाया करते थे,
पर अब तो हर रोज का हिसाब रखते हैं, जेब का भीख्याल रखते  है,
कितने बेखबर रहते थे हम इस दुनिया के झंझटों से!
जब माँ- बाप के पास और उनके साथ रहते थे!!
न जाने कैसे पर हर चीज का इंतजाम खुद हो जाता था,
हमे तो बस दुकान जाकर अपना सामान लाना था,






A Day with Nature!!

A day with nature I spent.........
A unique love I felt,
Green grass and the tiny drop of dew melt,
And, the fragrance of flower I smelt,
A day with nature  I spent.......

I saw a butterfly,

And, I ran towards it at full pelt,
it was beautiful with the color of a rainbow,     
I went close to it and touched, Alas! it bent,

A day with nature I spent.........


I saw the mountains and the peaks,

I walked on it up-ride and 
then I realized the truth of life is wide,
I saw a river its wandering water and its waves were touching the shore and singing a sweet song,

A day with nature  I spent....... 


Next, my eyes fall upon a pair of birds chattering together, 
like, they were sharing their pain and pleasure,
and in a big green oak tree, they dwelt, 
wow!the scene was so pretty, I felt, 

A day with nature I spent....... 

now, I started a slow walk towards the forest,
I saw big trees, and also some bees,
colorful flowers rose, lily, Marigold, and Iris,
a floating lake, sometimes calm like a blissful heart,  
and sometimes paused like a depressed mind or a broken heart,
Dancing water of the fountain and tip-top-tip slowly dropping rain,
It filled my heart with glee, slowly  
I immersed myself in the natural beauty,
and the smell of beauty I smelt, 

a day with nature I spent.......


I looked upon in the Sky, it appeared Moon,
blushing with the love of its surrounding lights,
Stars were twinkling as they were celebrating happiness
after seeing all this I surprised,
How charming and beautiful is nature! I felt,

a day with nature I spent.......











बेबस किसान की भगवा न से प्रार्थना

हे! प्रभु कुछ हम पर भी रहें करो,
कुछ दौलत नहीं मांगता बस थोड़ी सी गीली बरसात करो,
कुछ अरमानो के साथ की थी फसल,
सोचा न था की होगी कुदरत की ऐसी उथल- पुथल,
कुछ  दिन  बाद बिटिया की बारात है,
बस उसी के लिए जोड़े कए हाथ है,
लड़के वालो को गाड़ी,और पैसा चाहिये,
हमको आपसे बस थोड़ी सी मदद चाहिए,
बच्चों की स्कूल की फीस भी बाकी है, 
छोटू का बस्ता,पेन और पेंसिल भी बाकि है,
अगले महीने होली का त्यौहार है,,
कुछ कपडे, मिठाइ और कपडे भी लेने है,
पिछली बार धान किया तो कर्ज भी न निपट सका,
तो इस बार किया कुछ ईख और कुछ कपास,
अब तो कर्ज फिर से बढ़ गया,
क्या करू भगवन मई बेबस हो गया, 
हे प्रभु तुम करो कुछ चमत्कार,
ज्यादा नहीं बस थोड़ा सा उपकार,
आज बिटिया को बारात के कपडे लेने को कहा था,
दिन भर बीत गया कुछ इंतज़ाम भी न हो सका,