कितने बेखबर रहते थे हम इस दुनिया के झंझटों से!
जब माँ- बाप के पास और उनके साथ रहते थे!!
न जाने कब दिन और कब दिन से फिर रात,
अब तो सुबह जल्दी घर से निकलते है और,
और फिर जल्दी घर जाने के लिए रात का इंतज़ार करते है,
रोज सुबह पापा के साथ घर के बाहर हरे मैदान में कुछ देर की सैर करता था,
और आराम से घर आकर इक गिलास दूध पीता था,
अब तो बस दफ्तर जाने की जल्दी होती है,
इक कूप चाय मुनासिब हो जाये बस वही बहुत है,
हर पल और हर दिन का लुफ्त उठाया करते थे,
कितने बेखबर थे हम इस दुनिया के झंझटो से!
जब माँ- बाप के पास और उनके साथ रहते थे!!
सुबह उठकर माँ के पैर छूकर आशिर्बाद लिया करते थे,
बस यूँ लगता था मानो अब आज का दिन शुभ है,
अब तो बस सुबह- सुबह बॉस ताने सुनते है ,
अपनी समस्याओं की तो कोई खबर ही न थी,
सब माँ- बाप पे छोड़ दिया करते थे,
पर अब तो दिन गुजर जाता है दफ्तर में रोज इक नयी समस्या सुलझाने में,
कितने बेखबर रहते थे हम इस दुनिया के झंझटों से!
जब माँ- बाप के पास और उनके साथ रहते थे!!
वो छोटी सी कुर्सी जो मैंने रामलीला के मेले से जिद करके मंगाई थी पापा से,
बड़ा ही सुकून मिला करता था उस कुर्सी पर बैठकर,
पर आज उस दफ्तर की कुर्सी पर तो सारा दिन बीत जाता है,
पर न जाने क्यों वो वाला आराम और सुकून नहीं मिलता,
कुछ ज्यादा कीमती न हुआ करते थे वो छोटे-छोटे खिलौने,
पर न जाने क्यों वो इक अजीब सी ख़ुशी का अहसास दिलाया करते थे,
कितने बेखबर रहते थे हम इस दुनिया के झंझटों से!
जब माँ- बाप के पास और उनके साथ रहते थे!!
जब खाने के लिए माँ बुलाया करती थी,
बड़े नखरे हुआ करते थे तब, तुरई,लौकी,और बैंगन बनने पे रूठ जाया करते थे,
और फिर क्या बस मेरे मनपसंद आलू के पराठे बन जाया करते थे,
अब तो इतना थक जाते है शाम को घर आने तक,
की बस चाटने रोटी ही खाकर सो जाया करते है,
कितने बेखबर रहते थे हम इस दुनिया के झंझटों से!
जब माँ- बाप के पास और उनके साथ रहते थे!!
होली के दिन अपने मनपसंद कपडे लाया करते थे,
दिवाली पे पटाखों और फुलझड़ियो को भी बेहिसाब लाया करते थे,
अब तो कपडे और पटाखे खरीदने से पहले जेब टटोलते है,
पैसो का हिसाब ही नहीं करते थे हर रोज जेब में थोड़े खुदबखुद आ जाया करते थे,
पर अब तो हर रोज का हिसाब रखते हैं, जेब का भीख्याल रखते है,
कितने बेखबर रहते थे हम इस दुनिया के झंझटों से!
जब माँ- बाप के पास और उनके साथ रहते थे!!
न जाने कैसे पर हर चीज का इंतजाम खुद हो जाता था,
हमे तो बस दुकान जाकर अपना सामान लाना था,
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